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मिथिला मे देखाइ ते पड़ै, परन्तु न फरय न फुलाय . . .

मिथिला क बुझौअलि मे आइ एहन बुझौअलि देल गेल छै जे मिथिला मे देखाइ ते पड़ै छै,  परन्तु  एतय न फरय न   फुलाय  छै!  इ बुझौअलि सभ' कय बुझू ते जानि  . . .   | १ |  फरय न  फुलाय ढाकी-ढाकी बहराय। | २ |  फरय न  फूलाय ढाकी-ढाकी बिकाय | ३ | फरय न फूलाय उपरे उड़ल जाय | ४ | फरय न  फुलाय सुरंग-सुरंग बढ़ल जाय | ५ | फरय न फुलाय कान सँ बहराय | ६ | फरय न फुलाय  बढ़ले जाय  एतय देल बुझौअलि मे से पहिल चारि हमर स्वर्गीय बाबूजी प्रेम शंकर सिंह (ग्राम - जोगिआरा, जिला - दरभंगा) क मिथिला क बुझौअलि संकलन आ शेष दू टा पारम्परिक 'फरय न फुलाय' जकाँ नवनिर्मित बुझौअलि अछि।  अहुँ 'फरय न फुलाय' बुझौअलि बनाय कय भेजि सकैत छी।  - प्रणव कुमार सिंह, नॉएडा  ***   अपन उत्तर जाँचै लेल नीचाँ स्क्रोल करू  . . .  > > > > > > > > > > > > > > > > > > > > > > > > > | १ | छाउर | २ | नोन | ३ | धुइयाँ | ४ | बाँस | ५ | गुज्जी ...

बूढ़ी नानी क बुझौअलि

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हमर बूढ़ी नानी (जया देवी, १९००-१९९४; प्रबोध ना रायण सिंह क माय; ग्राम -  सहमौरा ; जिला - सहरसा) क आर एकटा बुझौअलि अहुँ सभ आनंद लियउ।  तर मे बाति ऊपर बाति नहि बुझनिहार क कान काटि मिथिला क इ बुझौअलि कय बुझू ते जानि . . .  - सुमंत सिंह, जमशेदपुर 

बूढ़ी नानी क बुझौअलि

हमर बूढ़ी नानी हम नेना-भुटका सभ सँ "एक रत्ति क" कतेक बुझौअलि पूछने रहथि।  ओहि मे जे यादि छय, से सभ अहाँ लोकनि सँ पूछि रहल छी। १) एक रत्ती क मुसरी, पुआर तर घुसरी। २) एक रत्ती क छौरी क कसल बाँहि। ३) एक रत्ती क भाउल मियाँ, बड़का गो पुछरी। ४) एक रत्ती क छौरी क लाल घघरी। ५) एक रत्ती क फुदकी, फुदकल जाय, सौंसे धरमपुर लुटने जाय। मिथिला क किछ भाग मे "एक रत्ती क  . . ."  बुझौअलि क आर दू टा रूप अछि - "तनि गो . . ." आ "नान्हिटा  . . ." अहाँ इ बुझौअलि  कय  कोनो रूप मे देखु, अहाँ कय मिथिला क रंग भेंटत। एहि बुझौअलि सभ के अहाँ बुझू ते जानि  . . . अपन उत्तर नींचा कमेन्ट मे लिखू !    

बूढ़ी नानी क बुझौअलि

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 मिथिला मे बुझौअलि पुछय-बुझय क परिपाटी बड्ड पुरान अछि। बियाहक समय बराती-सराती क बुझौवल सँ नोंक-झोंक, बड़ सभक नैना-भुटका सँ बुझौवल क खेल खेलानाय मिथिलाक केकरा नहि मन हैत! बुझौअलि सँ मनोरंजन क संगे ज्ञान ओ बढ़ैत छै आ अपन भाषा, भाषा क चमत्कार, संस्कृति आ परिवेश सँ पीढ़ी-स-पीढ़ी लोग जुड़ल रहैत छय।  मनोरंजन आ अपन माइट-पाइन से जुड़ल राखि लेल, हमर बूढ़ी नानी (जया देवी, १९००-१९९४; प्रबोध नारायण सिंह क माय; ग्राम - सहमौरा; जिला - सहरसा) कलकत्ता शहर में रहैत-बड़ होइत हम सभ सौं साँझ के गइल सदी क सत्तर आ अस्सी दशक मे भाँति-भाँति क बुझौवल पुछथि, आ हम सभ ओकर उत्तर खोजबाक प्रयास करतौन। ओहि समय खिस्सा आ बुझौअलि मनोरंजनक सबसँ पैघ साधन छल . . . कलकत्तो मे किये न साँझ मे प्रायः बत्ती गुल भ' जाय रहै आ खेल के एबाक बाद आ लालटेन क इजोत मे पढ़ाई आरम्भ करय स पहिने अथवा सुतय जाय से पहिने बूढ़ी नानी क खिस्सा आ बुझौअलि बिना सुनने ऊँघी त' आबैत ए नहि छल ।    किछ दिन पहिने अपन किताब-कागज क अम्बार में हमर एकटा कॉपी भेंटल। ताहि मे बूढ़ी नानी द्वारा पूछल किछ बुझौअलि लिखल रहय। ओहि सभ बुझौअलि अपने सभ लेल इहाँ दय ...