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अहाँ कि जनैत रहि?

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मिथिला मे लोक-साहित्य क परंपरा बड्ड पुरान अछि। अहाँ कि जनैत रहि, आइ मिथिला मे "बुझौअलि" क नाम से प्रचलित बुद्धि क परीक्षण  क खेल संस्कृत भाषा क "प्रहेलिका" परम्पराक क वंशज अछि। अन्य भारतीय भाषा सभ मे "प्रहेलिका" कोनो-न-कोनो रूप में आ कोनो-न-कोनो नाम सँ आइयो प्रचलित अछि, मुदा मिथिला मे बुद्धि-परीक्षण क खेल नव स्वरूप लेलकय, जेकर उदाहरण अन्य भारतीय भाषा में नय भेंटय छय। एहन एकटा स्वरूप भेल "अहियारी।" बीतल सदी क नब्बे के दशक तक (जहिया धरि हम मिथिला मे बियाह देखने छियय), मिथिला क बियाह में सराती-गण दुआरि लगबाक क पश्चात बराती क स्वागत आ दूल्हा क बुद्धिमत्ता क परीक्षण "अहियारी" से करैत जाय रहय। हँसी-ठट्टा, नोक-झोंक, कहा-सुनी क अन्त त' सदैव बराती क पक्ष में होयत रहय, मुदा विवाह आयोजन संबंधी तनाव क लोप भ' जायत रहय। दूल्हा के संगे दुनू दिस के पाहुन (घर क बेटी क दूल्हा) सभक "अहियारी" मे विशिष्ट भूमिका रहय छलय। (आशा अछि जे मिथिला क बियाह मे "अहियारी" क परम्परा आइयो चलि रहल छय।) मैथिली एवं मैथिली से जुड़ल मिथिला क संस्कृति...