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बूढ़ी नानी क बुझौअलि

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 मिथिला मे बुझौअलि पुछय-बुझय क परिपाटी बड्ड पुरान अछि। बियाहक समय बराती-सराती क बुझौवल सँ नोंक-झोंक, बड़ सभक नैना-भुटका सँ बुझौवल क खेल खेलानाय मिथिलाक केकरा नहि मन हैत! बुझौअलि सँ मनोरंजन क संगे ज्ञान ओ बढ़ैत छै आ अपन भाषा, भाषा क चमत्कार, संस्कृति आ परिवेश सँ पीढ़ी-स-पीढ़ी लोग जुड़ल रहैत छय।  मनोरंजन आ अपन माइट-पाइन से जुड़ल राखि लेल, हमर बूढ़ी नानी (जया देवी, १९००-१९९४; प्रबोध नारायण सिंह क माय; ग्राम - सहमौरा; जिला - सहरसा) कलकत्ता शहर में रहैत-बड़ होइत हम सभ सौं साँझ के गइल सदी क सत्तर आ अस्सी दशक मे भाँति-भाँति क बुझौवल पुछथि, आ हम सभ ओकर उत्तर खोजबाक प्रयास करतौन। ओहि समय खिस्सा आ बुझौअलि मनोरंजनक सबसँ पैघ साधन छल . . . कलकत्तो मे किये न साँझ मे प्रायः बत्ती गुल भ' जाय रहै आ खेल के एबाक बाद आ लालटेन क इजोत मे पढ़ाई आरम्भ करय स पहिने अथवा सुतय जाय से पहिने बूढ़ी नानी क खिस्सा आ बुझौअलि बिना सुनने ऊँघी त' आबैत ए नहि छल ।    किछ दिन पहिने अपन किताब-कागज क अम्बार में हमर एकटा कॉपी भेंटल। ताहि मे बूढ़ी नानी द्वारा पूछल किछ बुझौअलि लिखल रहय। ओहि सभ बुझौअलि अपने सभ लेल इहाँ दय ...