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मिथिला मे देखाइ ते पड़ै, परन्तु न फरय न फुलाय . . .

मिथिला क बुझौअलि मे आइ एहन बुझौअलि देल गेल छै जे मिथिला मे देखाइ ते पड़ै छै,  परन्तु  एतय न फरय न   फुलाय  छै!  इ बुझौअलि सभ' कय बुझू ते जानि  . . .   | १ |  फरय न  फुलाय ढाकी-ढाकी बहराय। | २ |  फरय न  फूलाय ढाकी-ढाकी बिकाय | ३ | फरय न फूलाय उपरे उड़ल जाय | ४ | फरय न  फुलाय सुरंग-सुरंग बढ़ल जाय | ५ | फरय न फुलाय कान सँ बहराय | ६ | फरय न फुलाय  बढ़ले जाय  एतय देल बुझौअलि मे से पहिल चारि हमर स्वर्गीय बाबूजी प्रेम शंकर सिंह (ग्राम - जोगिआरा, जिला - दरभंगा) क मिथिला क बुझौअलि संकलन आ शेष दू टा पारम्परिक 'फरय न फुलाय' जकाँ नवनिर्मित बुझौअलि अछि।  अहुँ 'फरय न फुलाय' बुझौअलि बनाय कय भेजि सकैत छी।  - प्रणव कुमार सिंह, नॉएडा  ***   अपन उत्तर जाँचै लेल नीचाँ स्क्रोल करू  . . .  > > > > > > > > > > > > > > > > > > > > > > > > > | १ | छाउर | २ | नोन | ३ | धुइयाँ | ४ | बाँस | ५ | गुज्जी ...

बूढ़ी नानी क बुझौअलि

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हमर बूढ़ी नानी (जया देवी, १९००-१९९४; प्रबोध ना रायण सिंह क माय; ग्राम -  सहमौरा ; जिला - सहरसा) क आर एकटा बुझौअलि अहुँ सभ आनंद लियउ।  तर मे बाति ऊपर बाति नहि बुझनिहार क कान काटि मिथिला क इ बुझौअलि कय बुझू ते जानि . . .  - सुमंत सिंह, जमशेदपुर 

अहाँ की जनैत रहि?

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छवि विकिपीडिया क सौजन्य सँ भारतीय संविधान क अष्टम अनुसूची (जाहि मे कुल 22 भारतीय भाषा कय राष्ट्रीय भाषा क मान्यता प्रदत्त अछि) मे मैथिली कय संविधान क बिरानबेवाँ संशोधन अधिनियम, 2003 सँ सम्मिलित कयल गेल रहय।  मूल संविधान (1950) में 14 भाषा (असमिया, ओड़िया, उर्दू, कन्नड़, कश्मीरी, गुजराती, तमिल, तेलुगू, पंजाबी, बांग्ला, मराठी, मलयालम, संस्कृत आ हिंदी) कय संवैधानिक मान्यता देल गेट रहय।  सिन्धी कय 21वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1967 मे;  कोंकणी, मणिपुरी, आ नेपाली कय 71वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 मे; आ   बोड़ो, डोगरी, मैथिली आ संथाली भाषा कय 92वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 मे   संविधान मे भारतीय भाषा होयबाक मान्यता देल गेल रहय।  मिथिला क समस्त वासी; बिहार, झारखण्ड, नेपाल मे बसल मैथिली भाषी आ सम्पूर्ण जगत मे फैलल मैथिल सभ लेल इ गौरव क विषय अछि!  इ ऐहितासिक उपलब्धि कय आगू बढ़बय लेल  मैथिली मे केवल बजनाय जरुरि नहि छय, परञ्च लिखनाय, पढ़नाय आ सरकारी कामकाज सँ जोड़नाय ओ जरुरि छय।     अपन मातृभाषा क सम्पोषण आ भविष्य हमर सभ क हाथ म...

बूढ़ी नानी क बुझौअलि

हमर बूढ़ी नानी हम नेना-भुटका सभ सँ "एक रत्ति क" कतेक बुझौअलि पूछने रहथि।  ओहि मे जे यादि छय, से सभ अहाँ लोकनि सँ पूछि रहल छी। १) एक रत्ती क मुसरी, पुआर तर घुसरी। २) एक रत्ती क छौरी क कसल बाँहि। ३) एक रत्ती क भाउल मियाँ, बड़का गो पुछरी। ४) एक रत्ती क छौरी क लाल घघरी। ५) एक रत्ती क फुदकी, फुदकल जाय, सौंसे धरमपुर लुटने जाय। मिथिला क किछ भाग मे "एक रत्ती क  . . ."  बुझौअलि क आर दू टा रूप अछि - "तनि गो . . ." आ "नान्हिटा  . . ." अहाँ इ बुझौअलि  कय  कोनो रूप मे देखु, अहाँ कय मिथिला क रंग भेंटत। एहि बुझौअलि सभ के अहाँ बुझू ते जानि  . . . अपन उत्तर नींचा कमेन्ट मे लिखू !    

मिथिला क लोकगीत: करिया झुम्मरि (खेलगीत)

मिथिला क लोकगीत करिया झुम्मरि ^   (खेलगीत) हे मझलो, की छोटको? बड़को कहाँ गेल? बाँस काटै! बाँस मे की? पौंती! पौंती मे की? झरनी! झरनी मे की? कंघी! कंघी मे की? केस! केस मे की? ढील! ढील मे की? लीख! लीख पटापट मारै छी  करिया झुम्मरि खेलै छी  लीख पटापट मारै छी  करिया झुम्मरि खेलै छी  *** (^ पुस्तक "शिशु गीत और खेल (मैथिली लोकगीत मे)", संकलनयित्री अणिमा सिंह, प्रकाशक, मिथिला दर्शन प्राइवेट लिमिटेड, कलकत्ता, १९६९, पृ० २५ सँ उद्धृत।)  "करिया झुम्मरि" मिथिला क कण-कण मे गूँजैत नैना सभ प्रिय खेलगीत अछि। मिथिला क बुझौअलि मे "करिया झुम्मरि" बुझौअलि क संग मिथिला क आन सभ लोक-संस्कृति धरोहर कय भविष्य लेल संचयन क उद्देश्य क एकटा प्रयास।    प्रणव कुमार सिंह, नॉएडा   

मिथिला क बुझौअलि क भूमिका आ निवेदन

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मिथिला क बुझौअलि (𑒧𑒱𑒟𑒱𑒪𑒰 𑒏 𑒥𑒳𑒗𑒾𑒁𑒪𑒱, Maithili Riddles)  नेना-भुटका, बड़-बूढ़ सभ क लेल मिथिला क सरल, मजेदार आ सब रँग क बुझौअलि क एकटा विशिष्ट साइट अछि। एतय मिथिला मे  बुझौअलि क परम्परा, इतिहास, भिन्न प्रकार क  बुझौअलि संग्रह भेटत। अहाँ कय किछ  बुझौअलि  उत्तर सह भेटत आ किछ  बुझौअलि  बुझै पड़त आ ओकरा बुझि कय ओकर उत्तर दिय पड़त !       हमर सभ क प्रयास छय जे https://mithilakbujhaual.blogspot.com क माध्यमे मिथिला क भाषा, संस्कृति आ लोक-परम्परा क एकटा महत्त्वपूर्ण  विधा - मिथिला क बुझौअलि - क संरक्षण आ पोषण भ' सके। जनमानस क मनोरंजन आ अपन भाषा आ संस्कृति सँ जुड़ल रहबाक/रखबाक मे बुझौअलि सन आर कोनो सशक्त/पैघ साधन नहि अछि। मुदा बदलैत समय मे जनमानस क मन सँ बुझौअलि क्रमशः लोप भेल जाइल रहल अछि। इ नीक गप्प नहि अछि !      जदि हम सब मिल कय बुझौअलि क संरक्षण आ सम्पोषण क प्रयास नहि करि, ते इ काज के करत?  समस्त मिथिला क स्मृति सँ मिथिला क बुझौअलि क संग्रह, बदलैत समय लेल नव  बुझौअलि क निर्माण आ एहि लोक-परम्परा ...

मैथिली भाषा आ साहित्य मे उत्कृष्ट योगदान लेल "प्रबोध साहित्य सम्मान" सँ विभूषित मिथिला क साहित्यकार

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"प्रबोध साहित्य सम्मान" मैथिली भाषा आ साहित्य मे उत्कृष्ट योगदान लेल मिथिला क सर्वोच्च सम्मान अछि।  सं २००४ सँ कलकत्ता क प्रबोध नारायण सिंह (१९२४-२००५) क स्मृति मे स्थापित "प्रबोध साहित्य सम्मान" मैथिली भाषा आ साहित्य मे उत्कृष्ट योगदान लेल देल जाय छय। "प्रबोध साहित्य सम्मन" क स्थापना मैथिली भाषा आ साहित्य क उन्नति लेल समर्पित संस्था स्वस्ति फाउंडेशन द्वारा कयल गेल छल जाहिमे एक लाख टका सह स्मारक देल जाय छय।   स्वर्गीय प्रबोध नारायण सिंह कलकत्ता सँ सं १९५० सँ मैथिली भाषा आंदोलन से जुड़ल रहथिन। एहि क्रमे मैथिली मे व्यापक साहित्य क अभाव क आरोप के खण्डन करय लय, अहाँ कलकत्ता सँ "मिथिला दर्शन" नामक मासिक साहित्यिक पत्रिका क स्थापना कयने रहथिन। "मिथिला दर्शन" में कथा-कविता सह निबंध, आलोचना, नाटक, मिथिला क साहित्यिक धरोहर पर लेख, समस्त मिथिला क भाषा संबंधी आंदोलन क समाचार इत्यादि छपय रहय। १९५० क दशक पूर्वार्द्ध में स्थापित "मिथिला दर्शन" पुरान लेखक-कवि सह नवलेखन कय प्रोत्साहन देने रहय। संगहि मिथिला दर्शन मैथिली मे पुस्तक आ आधुनिक विधा ...

मैथिली मे साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता साहित्यकार

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सं १९५४ अपन स्थापना क संगहि साहित्य अकादेमी हर बरिस अपने दिस सँ मान्यता प्रदत्त भारत क प्रमुख भाषा सभ मे से प्रत्येक भाषा मे प्रकाशित सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक कृति कय "अकादेमी पुरस्कार" प्रदान करैत छय। पहिल बेर इ पुरस्कार भारत क १५ भाषा कय १९५५ मे देल गेल। सं २०१० सँ विजेता कय ₹१,००,००० क राशि देल जाय रहल छय।   १९६६ सँ साहित्य अकादेमी मैथिली मे "अकादेमी पुरस्कार देनाइ आरम्भ कयलाह। असमिया, ओड़िआ, अँग्रेजी, उर्दू, कन्‍नड, गुजराती, तमिऴ, तेलुगु, पंजाबी, बाङ्ला, मलयाळम्,  मराठी, संस्‍कृत, हिन्‍दी (वर्णमाला क्रम सँ १९५५ क आठम सूची क वर्णित १४ राष्ट्रीय भाषा), कश्‍मीरी आ सिन्धी (१९५९) भाषा क बाद मैथिली सत्रहम भारतीय भाषा छय, जाहि मे साहित्य अकादेमी अपन पुरस्कार देनाइ आरम्भ कयलाह। मैथिली क बाद डोगरी (१९७०); मणिपुरी (१९७३); राजस्‍थानी (१९७४); कोंकणी आ नेपाली (१९७७); आ बोडो आ संताली (२००५) के साहित्य अकादेमी सँ पुरस्कार क मान्यता भेटल। आइ कुल २४ भारतीय भाषा मे साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल जाइछ छय।   मैथिली लेल इ गौरव क गप्प छय जे राष्ट्रीय स्तर पर साहित्य अकादेमी मैथिली कय...